इतिहास


1882 - 1894

Poet बिहार प्रदेश के चंपारण जिले में मधुबन थाना अंतर्गत डॉक्टर मेहसी समीपस्थ पर हरपुरनाग नामक ग्राम में कवि श्री रामजी शरण विद्यांचल प्रसाद ‘किंकर’ का जन्म 22 अगस्त 1882 (संवत 1939 भादव शुक्ल चौदश) को एक साधारण ज़मींदार के घर श्रीवास्तव कुल में हुआ। वे डेढ़-दो वर्ष की आयु में ही अपनी मां की गोद से हरिहर क्षेत्र की यात्रा के समय गिरकर नारायणी नदी में डूब गए थे। भागदकृपा से किसी मल्लाह ने छानकर माँ की गोद को सुशोभित कर उन्हें आनंद सागर में डाल दिया।

किंकर जी की चाल-ढाल और शैलस्वभाव वाल्यावस्था में ही प्रशंसनीय था। आठ-दस साल की उम्र में ही कवि जी के हृदय से भागवतभक्ति अनुकृत होकर दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी थी। उनके पिता जी ने तभी से हिन्दी व पारसी साहित्य तथा कुछ समय बाद अंग्रेज़ी का अध्ययन कराना शुरू किया। उनकी प्रखर बुद्धि और स्मरण शक्ति पर परंपरा प्रशंसनीय व जानकार लोग मुग्ध रहते थे। उनकी स्कूली शिक्षा मैट्रिक से कम थी लेकिन बारह वर्ष की आयु से ही उनका रुझान कविताओं की ओर था और वे रचनाएँ करने लगे थे।



1895 - 1901

सन 1895 से 1901 के बीच छह सालों में उन्होने “श्री कृष्णायण” महाकाव्य की रचना की और साथ ही उन्होंने पिंगलादि धंदोग्रंथ और हिंदी संस्कृत नाना ग्रंथ वलोगन किया। किंकर जी ने 17 वर्ष की अवस्था में ही मृगुक्षेत्र निवासी परम विद्वान वैष्णव महात्मा पंडित श्री रामकृष्ण शर्मा से “श्री राम मंत्र” की शिक्षा दीक्षा ली।

इस समय कवि जी का विवाह हुआ और कुछ समय बाद उन्हें एक पुत्री व पाँच पुत्रों की प्राप्ति हुई परंतु धीरे-धीरे बाल्यावस्था में ही सब परलोक सिधार गए। इसके बाद कवि जी पलाधि झंझार से मुक्त होकर दंपत्ति सुख पूर्वक भगवत भजन में रम गए व भक्ति के सागर श्री महाबीर जी के भी परम प्रेमी और कृपा पात्र बने।



1902 - 1957

किंकर जी श्री महावीर जी की मूर्ति स्थापना कर श्री शाल ग्राम भगवान सहित पूजा भी करने लगे व उन पर मूर्ति पूजा व कविताओं की धुन सवार हो गई थी। उन्होंने दीक्षा गुरु के सिवा और भी तत्व ज्ञानी योगी सहगुरुओं की सत्य संगति में सुख प्राप्त किया।

“श्री कृष्णायण” के अतिरिक्त किंकर जी ने अनेक पुस्तकें रची। वे कश्मीरी उर्दू और अंग्रेज़ी मंऔ भी पद रचना कर लेते थे तथा कविताओं के अतिरिक्त वेद विद्या तथा ज्योतिष और तंत्र शास्त्र में भी निपुण थे।

“श्री कृष्णायण” की रचना पूर्ण होने पर कवि जी उसे छपवाने के लिए कई लोगों के पास गए लेकिन किसी ने इस धर्म ग्रंथ पर खड़े होकर सुयश नहीं लूटा अतः यह ग्रंथ अपने सही मुकाम तक नहीं पहुँच सका। इसके लिए किंकर जी दिन-रात चिंतित रहा करते थे।

भगवत कृपा और प्रेरणा से कवि जी के क़रीबी एक ज़मींदार कुल भूषण - भूमिहार ब्राह्मण वंश तिलक परम वैष्णव बाबू विशंभर प्रसाद सिंह जी ने एक हज़ार रुपया बिना शुद्धि ऋण देकर ग्रंथ छपवाने के लिए साहस दिया तब उन्होंने अपने भतीजे बागीश्वरी प्रसाद को प्रकाशन की सहमति और उपाय से और कुछ रुपए घर से इकट्ठे कर पटना जाकर ग्रंथ छ्पवाना आरंभ किया साथ ही वहां रहकर संशोधन करने लगे। लगभग 4 महीने में ग्रंथ की 4 प्रतियाँ प्रकाशित करवा कर घर लाए जिसमें से एक प्रति उन्होंने पटना संग्रहालय में रखवाई, 2 अज्ञात लोगों को दी और एक अपने पास रखी।

किंकर जी हिन्दी के विखायत कवियों में एक श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' जी के गुरु भी रहे। जिन्होंने आगे चलकर 'किंकर' जी से मिली शिक्षा-दीक्षा का आजीवन सदुपयोग कर यश प्राप्त किया व हिन्दी को एक नई पहचान दिलाई।

कुछ समय बाद वे बीमार रहने लगे और 17 जून 1957 को महाकवि श्री रामजी शरण विद्यांचल प्रसाद जी परलोक वासी हो गए। गांव समाज में चारों तरफ उदासी छा गई। कवि जी का अंतिम संस्कार उन्हीं के पारिवारिक बगीचे में किया गया। किंकर जी अपनी अमर कृति हम सबके बीच छोड़ गए जिस अमर गाथा का हम सभी आज भी स्मरण करते हैं।

कवि श्री रामजी शरण विद्यांचल प्रसाद ‘किंकर’ जी को मिले सम्मान:
कवि ‘किंकर’ का उपनाम दिया गया
पटना साहित्य एकेडमी परिसर में कांग्रेस अध्यक्ष के द्वारा भेभर पुरस्कार दिया गया
डॉ राजेंद्र प्रसाद के द्वारा राष्ट्रपति प्रोत्साहन पुरस्कार ताम्रपत्र दिया गया
कश्मीर के नरेश द्वारा इन्हें महाकवि की उपाधि से नवाजा गया
दार्जिलिंग के राजा द्वारा भी पुरस्कृत किया गया
इसके अलावा अनेकों जगह से अनेकों प्रकार से प्रोत्साहन मिला


1957 - 2008

किंकर जी के जाने के बाद बागेश्वरी प्रसाद व उनके भाइयों में किंकर जी की गरिमा को कायम रखते हुए जन सेवा करना जारी रखा। उनके बानाए मंदिर की देख-रेख का ज़िम्मा सबने मिलकर उठाया। अगली पीढ़ी के कानपुर चले जाने के बाद भी परिवार के सभी सदस्य अपनी जड़ों से जुड़े रहे और गाँव के उत्थान के लिए मेहनत करते रहे।

इस दौरान किंकर जी के पौत्र श्री अरविंद कुमार सिन्हा जी समाज सेवी कार्यों से जुड़े रहे और पारिवारिक संस्कृति को बचाए रखा। हमने बहुत सुना और पढ़ा भी है जब हमारे महान कवियों, शायरों और कलाकारों ने कांटों के साथ गुलाब के फूल का संदर्भ लेकर अत्यंत तार्किक और रोचक अंदाज़ में ढेर सारी उपमाएँ दी हैं। उस मधुरता के साथ-साथ इंसान के जीवन का अर्थ और प्रेरणा स्त्रोत उत्पन्न होता है। हमने क़िस्से कहानियों में यह भी पढ़ा है कि कई शख्सियतों ने विदेश में जन्म लिया तो कुछ ने सोने के पालने में किलकारियां लगाईं। किसी की अभाव में आँख खुली और फिर उसने कामयाबी के शिखर तक पहुंचने में सफलता पाई।

यह विवेक विवेकी और विवेकशील से विकासशील बने युवा की दास्तान है जो एक अच्छे पृष्ठभूमि वाले परिवार में जन्मा लेकिन उस सुख और संपन्नता से उसका लालन-पालन नहीं हो सका। मध्यम वर्गीय परिवार तमाम समस्याओं और पहरों से जूझता हुआ चलता है और जब परिवार में कोई बीमार हो जाए तो दवाइयों का खर्च अलग।

सिन्हा साहब एक सरकारी मुलाज़िम थे और व्यक्तित्व के धनी और मधु भाषी होने के साथ ज़रूरतमंदों की मदद करने में सबसे आगे रहते थे इसलिए उनकी कद्र होती थी और सिन्हा साहब के नाम से मशहूर थे। वहीं अपने बचपन में महलों में पली उनकी धर्मपत्नी एक कुशल ग्रहणी की भूमिका में भी निपुण थीं हालांकि वह शहर के नामी स्कूल-कॉलेज में से पढ़ी ग्रेजुएट थीं लेकिन उन्हें इसका कोई घमंड नहीं था। मीठे स्वर में गाना गुनगुनाने वाली स्त्री और अपने अरमानों को अपने मन ने दफन रखने वाले सिन्हा साहब की गोद में जब बच्चा पलता है वो वह भी एक शानदार व प्रेरणादाई पल होता है।

वक्त के पास न्याय और अन्याय जैसी कोई स्थिति नहीं होती इसलिए लोग वक्त को बेरहम कहते हैं। दरअसल आप जैसा करते हैं उसकी परिणाम आपके सामने होता है फिर भी सिन्हा साहब की सहायक छवि व उनकी उदारता ने उन्हें बचत के रास्ते से विचलित कर दिया था ऊपर से बच्चों की परवरिश के खर्च, बीमारी में दवाइयों का खर्च जिसे सिन्हा साहब नहीं उठा पा रहे थे।

बाद में एक समय ऐसा भी आया जब वह कर्ज़ के लपेटे में आ गए और अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी से उतर गई। किसी के बहकावे में आकर उन्होंने लॉटरी में भी क़िस्मत आज़माई मगर वहां भी हर बार मायूसी ही हाथ लगी। अब आएगा... अब आएगा के लालच में लॉटरी के टिकटों पर पैसे लुटाते रहे लेकिन वहाँ भी क़िस्मत उनसे रूठी रही। स्थिति यहाँ तक आ गई कि पारिवारिक व बच्चों की स्कूली ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी उन्हे कर्ज़ लेना पड़ा। जब रिश्तेदारों ने आर्थिक मदद करनी चाही तो कर्ज़ इतना था कि उनकी दी गई राशि ऊँट के मुँह में जीरा साबित हुई और स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।

इतना सब होने के बाद भी सिन्हा साहब के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। वह हमेशा एक समान दिखते थे जैसे सब कुछ सामान्य हो। ऐसे ही मुस्कान और लोगों की मदद का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। उनकी दिनचर्या सदैव समान ही रही।

उनकी परिस्थिति की खबर धीरे-धीरे उनके दफ़्तर तक पहुँचने में ज़्यादा समय नहीं लगा। लेकिन उनकी मदद करने के बजाय कुछ लोगों ने सिन्हा साहब का उपहास उड़ाया तो वहीं उच्च अधिकारियों का भी कोई सहयोग नहीं मिला। परिवार ने भी किनारा कर लिया था। बस सिन्हा साहब थे और उनका अपना छोटा–सा परिवार था जिसकी असली ताकत उनकी धर्मपत्नी थीं जिन्होंने पति के साथ अभावों में जीने और अभावों में रहकर परिवार को चलाने में ख़ुशी ढूँढ ली थी। वह परिवार और सिन्हा साहब को संभालने के साथ अपने पति को मार्गदर्शन भी देती थीं। समय निकालकर डॉक्टर के यहां जाना और बाज़ार से घर का सामान लाना उन्हीं के ज़िम्मे था क्योंकि सिन्हा साहब को नौकरी से फुर्सत नहीं मिलती थी।


2009 - 2011

इलाहाबाद से सिविल इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद विवेक कुमार सिन्हा ने दुबई जाकर कड़ी चुनौतियों के बीच अपना सफर शुरू किया। उन्होंने अमीरात सरकार के लिए कई परियोजनाओं पर काम किया जिसके ज़रिए उन्होंने अपने सभी पारिवारिक ऋण चुकाए। न केवल अपने परिवार बल्कि अपने रिश्तेदारों व मित्रों को आर्थिक मदद देकर उनके जीवन को बादल दिया।

लगभग एक साल बाद श्री विवेक कुमार सिन्हा ने 2010 में अमीरात सरकार के अधिकारियों द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर अपनी कंस्ट्रक्शन कंपनी विजन कैटलिस्ट की स्थापना की। अपने मित्रों और परिवार की कर्जों से बाहर आने में मदद करने से उन्हें बहुत संतुष्टि मिली और आगे श्री सिन्हा अपनी कंपनी के सी॰एस॰आर॰ के माध्यम से अन्य ज़रूरतमंद लोगों की मदद करते रहे।


2011 - 2016

आजीवन समाज सेवी रहे किंकर जी से प्रेरित होकर उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए श्री अरविंद कुमार सिन्हा के बुलावे पर बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के अंतर्गत थाना महिती समीपस्थ हरपुरनाग गांव में दिनांक 26 मई 2012 को कवि जी के द्वारा निर्मित श्री महाबीर मंदिर में एकत्रित होकर श्री रामजी शरण विद्यांचल प्रसाद ‘किंकर’ के नाम पर एक संस्थान की स्थापना की जिसका नाम विंध्याचल सेवा संस्थान रखा गया।

संस्थान द्वारा किए गए कुछ कार्य:
• पिछड़ी एवं दलित बस्तियों की सफ़ाई
• विधवा व असाध्य रोग से ग्रस्त लोगों को निश्चित मासिक सहयोग राशि
• कवि जी श्री राम जी शरण विद्यांचल प्रसाद कवि किंकर द्वारा 19वीं सदी में स्थापित प्राचीन सिद्धपीठ राम जानकी सह महाबीर मंदिर का जीर्णोद्धार व प्रत्येक मंगलवार को क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा भजन कीर्तन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कराना
• किसी भी धर्म के त्योहारों के अवसर पर संबंधित स्थलों की साफ-सफाई एवं रंग-रोगन कराना
• समय-समय पर गांव में नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन कराना
• स्थाई चिकित्सालय एवं चिकित्सक की व्यवस्था करना
• शिक्षा से वंचित गरीब महिलाओं एवं बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना
• गंभीर रोग से ग्रस्त रोगियों को यथासंभव आर्थिक सहयोग प्रदान करना
• प्रकृतिक आपदा के समय प्रभावित व्यक्तियों का सहयोग करना
• दिव्यांग लोगों का अपेक्षित सहयोग करना
• अति निर्धन व्यक्तियों की बेटियों की शादी में अपेक्षित सहयोग करना
• तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था करना
• कन्या भ्रूण हत्या की रोक के लिए समाज को जागृत करना
• महापुरुषों की जयंती एवं पुण्यतिथि पर वृक्षारोपण करना
• धार्मिक अवसरों पर गरीबों में वस्त्र आदि का वितरण करना


2016 - 2019

17 जून 2016 को अरविंद कुमार सिन्हा कवि किंकर जी की धरोहर को यथा संभव आगे बढ़ाकर परलोक वासी हो गए और पूरे गाँव में उदासी छा गई। उनके जाने पर अरविंद जी द्वारा चलाए गए सभी कार्यक्रम व परियोजनाएं थम गईं लेकिन दूसरी ओर उनके पुत्र ने वैश्विक स्तर पर समाज सेवा जारी रखी व अपने पिता के आदर्शों को जीते रहे।


2020

इस वर्ष कोविड-19 के वैश्विक प्रकोप के चलते रुकी दुनिया ने विजन कैटलिस्ट समूह के चेयरमैन श्री विवेक सिन्हा जी को इतिहास के पन्ने टटोलने का वक़्त दिया जिससे उन्हें 138 साल के पारिवारिक इतिहास की पूरी जानकारी मिली। उन्हें विंध्याचल सेवा संस्थान की सोच, कवि किंकर की इच्छाओं और अपने पिता के संघर्षों के बारे में पता चला।

इसके बाद उन्होंने एक समिति का गठन किया और सभी मामलों का संज्ञान लेते हुए सी॰एस॰आर॰ के तहत विजन कैटलिस्ट का उतराधिकारी विंध्याचल सेवा संस्थान को बना दिया ताकि पारिवारिक धरोहर को आगे बढ़ाते हुए संस्थान के ज़रिए समाज कल्याण जारी रहे और कवि किंकर व अरविंद जी के सामाज से जुड़े सपने पूरे किए जा सकें।